KARNATAKA DIARY

>> 29 January 2014

बरस २०१२, मेरी शादी का बरस. ऐसा प्रतीत होता था जैसे अभी कुल जमा चार दिन भी नहीं हुए विवाह को. और उन्हीं दिनों में मुझे सुबह ४ बजे उठ तैयार होकर मथुरा से आगरा पार हज़रतपुर के केन्द्रीय विद्यालय में पेट की खातिर जाना होता था. और श्रीमती जी की तैनाती मथुरा के ही केन्द्रीय विद्यालय में थी. हम दोनों की नौकरी के मध्य एक ख़ास अंतर था . अंतर हमारी नौकरी स्थल की दूरियों का न होकर, नौकरियों के स्वभाव का था. मैं प्राइवेट शिक्षक के रूप में कार्यरत था और हमारी मोहतरमा स्थायी शिक्षक के रूप में पिछले दो बरस से कार्य कर रही थीं.

ऐसे में दिल में बस एक ही ख़याल आता था कि मेरी मेहनत कब रंग लाएगी. पिछले एक बरस से मैंने दिन रात एक करके तैयारी की थी सरकारी नौकरी के लिए और कई नौकरियों के इंटरव्यू भी दे रखे थे . मुझे प्रतीक्षा थी तो केवल ईश्वर की कृपा दृष्टि की. कब मेरे दिए हुए साक्षात्कार के परिणाम आयें. और फिर एक दिन वो शुभ घड़ी आई.

हमारा विवाह १ मई को हुआ था और लगभग डेढ़ माह बीत चुका था. मेरे ही एक परिचित ने मुझे ईमेल करके सूचना दी कि मेरा चयन नवोदय विद्यालय में पीजीटी शिक्षक के रूप में हो चुका है. कि मैं उसकी वेबसाइट पर जाकर अपना नाम और रोल नंबर भी देख सकता हूँ. यह ईमेल पढ़कर एकाएक मेरी धड़कने बढ़ गयीं और जब वेबसाइट पर अपना नाम और रोल नंबर पाया तो एक सुकून दिल में गहराता चला गया.

पास के ही दूसरे कमरे में किसी कार्य में व्यस्त राखी को बुलाया और सबसे पहले उसे गले लगाया और उसे सुखद सूचना से अवगत कराया. पहले ही क्षण उसका चेहरा ख़ुशी से चमक उठा और फिर धीरे-धीरे उसमें चिंता की रेखाएं भी उभर आयीं. मेरा चयन हैदराबाद रीजन में हुआ था. और जिसका साफ़ साफ़ मतलब था कि मुझे यहाँ से कोसों दूर जाना होगा. उसे मुझसे और मुझे उससे दूर रहना होगा. इस मिली जुली प्रतिक्रिया और ख़ुशी के मध्य हमें अपने वे बीते दिन याद हो आये जब सरकारी नौकरी ही हमारी शादी के बीच की खाई थी. जो आज शादी के डेढ़ महीने बाद पट गयी थी.

हम दोनों को ही पता था कि मेरी नौकरी बहुत जल्द लगने वाली है किन्तु केवल डेढ़ महीने में सुखद परिणाम आ जायेंगे, ऐसा सोचा न था. अगले दो रोज़ बाद मेरा बैंक क्लर्क के लिए भी चयन हो गया और कुछ दो एक रोज़ बाद बैंक पीओ की लिखित परीक्षा के परिणाम में भी मेरा रोल नंबर सबको साफ़ साफ़ दिखाई पड़ा. एक साथ मेरा पास इतने विकल्प उपलब्ध हो गए. कि राखी सबको एक बार कह देना चाहती थी कि देखो मैं जो कहती थी वो सच साबित हुआ. किन्तु ना तो अब वे बीते हुए दिन थे और ना ही वे क्षण. जबकि लगता था कि यदि हम दोनों की शादी न हुई तो फिर शायद यह जीवन भी न रहे. किन्तु परेशानी का सबब अब वो सब नहीं था. अब परेशान यह बात कर रही थी कि मुझे दूर जाना है. हजारों किलोमीटर दूर.

अगले कुछ रोज़ बाद सभी चयनित प्रतिभागियों के नाम के आगे विद्यालय, शहर और प्रदेश वितरित कर दिए गए. मुझे कर्नाटक का नवोदय विद्यालय दिया गया था. और फिर कशमकश इस बात की थी कि बैंक की नौकरी की जाए या विद्यालय में शिक्षक की. और यह द्वन्द अगले एक सप्ताह चलता रहा. अंततः यही सूझा कि शिक्षक की नौकरी करनी चाहिए क्योंकि मुझे पढ़ना-पढ़ाना अच्छा लगता है.

और इस तरह कर्नाटक के लिए मेरा बोरिया बिस्तर बंधने लगा...........


जिस पल तय हुआ कि कर्नाटक जाना है. बस उसी एक पल से दिल ख्यालों के महल खड़े करने लगा. कभी एक ख़याल आता तो उसे पीछे से धकेलता मुआं दूसरा आ धमकता. वे बेहद भावुक क्षण थे. प्रतिदिन, प्रत्येक क्षण एक नयी ख़ामोशी, एक नयी हलचल, एक नया रूप, एक नया दुःख, शेष रह गयी तमन्नायें लेकर आता. और दिल करता कि बस सब कुछ छोड़ दूँ, यह ख़याल कि कहीं जाना है और बस यहीं रहूँ राखी के पास. और इस तरह शेष रह गए ५-६ दिन बीते और फिर वह इन सबका अंतिम दिन जब भावनाएं अपनी शीर्ष पर थीं और मैं कहीं धरातल के भीतर. कुछ न चाहते हुए भी राखी ने धकेला और कुछ स्वंय के किसी कोने में बचे रह गए अरमानों ने, और इस तरह अपने साले साहबों और राखी के साथ रेलवे स्टेशन पहुंचा. रेलगाड़ी रात ११ के बाद की थी जो पहले से ही अपनी आदत मुताबिक़ देरी से आने को थी. और उन क्षणों में मैंने और राखी ने आँखों ही आँखों में कितना कुछ महसूसा और भोगा. यह व्यक्त नहीं किया जा सकता.

और फिर रेलगाड़ी का आना और राखी के हाथ का उस दिन का अंतिम स्पर्श, मेरा रेलगाड़ी में स्वंय को धकेला जाना और फिर रेलगाड़ी का चल देना.वह सीन स्मृतियों में आज भी फ्रीज़ होकर कहीं सुरक्षित रखा हुआ है.

कर्नाटक में जा रहा हूँ, यह सोचकर बचपन से दक्षिण भारत को लेकर जो स्मृतियाँ थीं कि वहाँ के लोग केवल काले होते हैं, उनका अपनी भाषा को लेकर दृढ होना. सांभर, चावलों की दुनिया, नारियल से लहलहाते रास्ते और खेतों में उगा हुआ धान. इन सबमें धीरे धीरे सुधार हुआ.

मैं बैंगलोर स्टेशन पर दोपहर में पहुंचा, जहाँ से मुझे फिर से अगले रेलगाड़ी में बैठना था. और बैंगलोर से शिमोगा को जाना था. बैंगलोर तक पहुँचते हुए ही मुझे ४० घंटे हो चुके थे. और फिर से अगले ६ घंटे. शाम ४:१५ की रेल से मैं शिमोगा के लिए निकल पड़ा. और फिर स्मृतियों में उलझी राखी की बात "यदि मन ना लगे तो वापस चले आना, तुम्हारे पास दूसरा विकल्प भी है." जो कि स्मृतियों को सुख देने के लिए काफी थी.

किन्तु मैं एकाएक वापस छोड़ कर चले जाने के लिए नहीं आया था.........


रेल का वह डिब्बा मेरे लिए तमाम किस्मों से अंजान चेहरों से भरा हुआ था. ये अंजान होना उत्तर भारत में सफ़र करते हुए साथ के बैठे अंजान होने वाले चेहरों से भिन्न था. यह एक नवीनतम एवं अलग किस्म का अनुभव था. वहाँ सभी लोग कन्नड़ भाषा में ही वार्तालाप कर रहे थे. और यह एक और बात जुड़ जाती थी उस नवीनता में.

आते हुए से एक दो रोज़ पहले राखी ने एक दफा हँसते हुए कहा था "परदेस जा रहे हो". और न जाने ये बात क्यों उस क्षण मेरी स्मृतियों के आईने पर अपनी शक्ल लेकर उभर आई. मैं उन चेहरों और आवाजों को विस्मय बोध के साथ देख और सुन रहा था. एक नस्ल दूसरे के अलग होने को किस तरह आसानी से पहचान लेती है. यह बात मैं अपनी ओर से उनके लिए भी सोच रहा था कि उनके लिए मैं शक्ल देखकर पहचान लिया जाने वाला उत्तर भारतीय होऊंगा. और हम अपनी भिन्न प्रकृतियों के बावजूद एक साथ, उसी एक डिब्बे में सफ़र कर रहे थे. उसी भारतीय रुपये को खर्च करके जिस पर गाँधी छपे हैं और जिन पर ना मैं ये मोहर लगा सकता कि यह उत्तर भारतीय रूपया है या दक्षिण भारतीय. और अगले ही क्षण में नवीन भावों से भर गया कि यह सीट जिसे में सुरक्षित समझ रहा हूँ, उस पर भी तो न जाने वे कौन कौन से लोग होंगे जिन्हें अपने लिए भी वही एहसास हुआ होगा जो मैं एक किसी पुराने क्षण में कर रहा था . किन्तु जो कितना झूठा और फरेबी एहसास था. वह सीट तो इसी रेल के इसी डिब्बे में रह जानी है. और हम अपने इस देश के अलग अलग हिस्सों से आये अपने हिस्से का रास्ता अख्तियार कर अपनी मंजिलों को तलाशेंगे.

मेरी पडोसी सीट पर जो शख्स बैठे हुए थे उन्होंने बातों ही बातों में बताया कि उनके पिता किसी पुराने समय में यहाँ राजस्थान से आये थे और फिर यहीं बस गए. और उनके लिए राजस्थान अब इतिहास की बात है. मैं सोचता हूँ कि यह नस्ल कहाँ की कहलाई जानी चाहिए. क्या मैं इसे भारतीय कहूँ. या कह दूं कि आप राजस्थानी रक्त हैं. या ये कह दूं कि आप तो बस इस इड़ली की तरह ही यहाँ के हैं. तो क्या हुआ जो इड़ली अब देश के हर कोने में उपलब्ध है.

रेलगाड़ी अपनी गति से आगे बढ़ती ही जा रही थी. उन रास्तों पर जिनसे होकर वापस एक दिन मुझे पुनः अपने मथुरा-आगरा-फिरोजाबाद के उसी नेशनल हाईवे के किसी प्लाजा में कोई हिंदी फिल्म देखनी है या किसी ढाबे पर खड़ी हुई बस में दाल तड़का खाकर पुनः बैठ जाना है.........


रेलगाड़ी अपनी तय समय सीमा से करीब आधा घंटा बाहर निकल चुकी थी. और यह जानते हुए भी कि शिमोगा अंतिम स्टेशन है, मैं चिंतित था कि वह कब आएगा. तीन चौथाई डिब्बा खाली हो चुका था और अंतिम स्टेशन किसी भी क्षण आने को था. यात्रीगण उसी एक क्षण की प्रतीक्षा में थे.

रेल की रफ़्तार ने आखिरकार दम तोड़ दिया और लोग धीरे-धीरे अपनी सीटों को असुरक्षित छोड़ कर जाने लगे. मैं किसी एक अनिभिज्ञ मुसाफिर की तरह स्टेशन से बाहर निकला. रेल अपने तय समय से १ घंटा देरी से पहुंची थी और मोबाइल रात ११ बजने की ओर इशारा कर रहा था.

मैंने प्रीपेड ऑटो की लाइन में लग पर्ची कटाई और जब ऑटो वालों से एक-एक कर अपने स्कूल जाने के लिए पूँछा तो कई ना सुन लेने के बाद मेरे कानों में हाँ का स्वर सुनाई दिया. जो कि देर रात के होने के अपने फायदे खोज़ रहा था. जो किराया मैंने पहले से स्कूल वालों से जानकर रखा था, यह स्वर १०० रुपये बढाकर मेरे कानों में गूँज रहा था.

देर काफी हो चुकने और पहुँचने की जल्दबाजी के चलते मैंने मोलभाव नहीं किया. अंततः मैं उस ऑटो में बैठ अपनी मंज़िल की ओर चल दिया. मेरे लिये रात के ग्यारह और बारह के बीच के समय का वह रास्ता बेहद स्याह काला, जंगली और कुछ कुछ डराने वाला प्रतीत हुआ. चारों और घने जंगल से प्रतीत हो रहे थे. डर इस बात का कि कहीं यह ऑटो चालक गलत इंसान ना निकले. मेरे मस्तिष्क में पहले से सुने सुनाये अपने उत्तर भारत के तमाम किस्से रह रह कर रिवाइंड होने लगे. वो करीब पंद्रह किलोमीटर का सफ़र मुझे बेहद लम्बा, उबाऊ प्रतीत होता रहा और साथ ही साथ ऑटो चालाक के गलत निकल आने की अपनी सम्भावनाओं ने मुझे आ घेरा.

अंततः जब वह स्कूल के समीप वाले कच्चे-पक्के रास्ते तक पहुँच गया तो उसने वहाँ ऑटो रिक्शा रोक ली. और वह अपनी प्राकृतिक आपदा से निपटने नहर के किनारे पहुँच कर खड़ा हो गया. मुझे कुछ संदेह प्रतीत हुआ तो मैं थोडा सतर्क होकर बैठ गया. और सोचा कि जो होगा सो देखा जायेगा. किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ. वह वापस आकर अपना ऑटो चलाने लगा और फिर कुछ २-३ मिनटों में हम स्कूल के मुख्या दरवाज़े तक जा पहुंचे. और भीतर प्रवेश करने के साथ ही यह खोज़ा जाने लगा कि कोई काम का आदमी मिले जिससे बात कर अतिथि गृह में रात बिताई जाए.

स्कूल के जिस कर्मचारी से मैंने अतिथि गृह के सिलसिले में पहले से बात कर रखी थी, उस भले आदमी को मैंने तकरीबन १२ बजे कॉल करके उठाया. और चंद बातों के बाद मैं अतिथि गृह मैं प्रवेश कर गया. और इस तरह रात का बंदोबस्त होने और सुबह की प्रतीक्षा की सुखद अनुभूतियों के साथ मैं बिस्तर पर सोने चल दिया......
 
 


6 comments:

PD 29 January 2014 17:44  

क्या बात है.. एक ही जगह सब के सब इकट्ठे.. बौत सही. :)

प्रवीण पाण्डेय 29 January 2014 21:23  

रोचक लग रहा है आपका अनुभव, विशेषकर बेंगलोर के आगे का।

Digamber Naswa 30 January 2014 12:41  

रोचक ... अनिल जी आपको पढ़ना इतने दिनों बाद अच्छा लगा ..

Janak Kumar Yadav 10 February 2014 04:17  

प्रेम रस, हास्य रस, भय रस, भारतीय रस, उत्तर भारतीय रस और दक्षिण भारतीय रस कि एक साथ अनुभूति (पढ़) कर बहोत अच्छा लग… नए नौकरी कि ढेर सारी बधाइयाँ! ईश्वर आपको और तरक्की दे!

Parmarth Suman 13 March 2014 15:07  

अनिल जी पहले की तरह फिर से आपकी अचूक लेखनी को मेरा सलाम। वाकई आप अदभुत लेख के धनी हैं।

अनिल जी अब आपको बहुत विलम्‍ब से ही सही लेकिन सरकारी नौकरी की बधाई।

आशा ही नहीं पूर्ण विश्‍वास है कि सरकारी सेवाकार्य करते हुए भी आप अपनी लेखनी से हमें यूं ही रूबरू कराते रहेंगे।

Post a Comment

Related Posts with Thumbnails

  © Blogger template Simple n' Sweet by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP