स्वर

>> 08 October 2012

कोई बात थी पुरानी जो स्मृतियों में उलझ गयी थी। जैसे पुराने रिकार्ड पर कोई अटका हुआ स्वर । वो स्वर जिसके बाद के स्वर हम पकड़ना चाहते हों . किन्तु उस चाहना के लिए हमें उस उलझे हुए रिकार्ड को दुरुस्त करना होता . 

                फिर एकाएक मन उस अटकी हुई आवाज़ को वहीँ छोड़कर दूर चला जाता . और वह पुरानी बात स्मृतियों में कहीं दबकर रह जाती . जैसे अभी अभी कहीं से पदचाप के स्वर गूँजे हों किन्तु वे स्वर वहीं कहीं पैरों तले दबकर रह गए हों। जैसे कोई भूली हुई याद। जिसे भुलाने के लिए भूला जाता है . किन्तु वह वहीं कहीं रहती है स्मृतियों में उलझी हुई  .

उस उदास गर्म शाम में गर्मजोशी के नाम पर कुछ भी नहीं था कि किसी पुरानी चाहना को याद कर लिया जाता और मन एकाएक प्रसन्न हो उठता कि  अरे उस बुझती हुई शाम को जब जाना था कहीं तो क्यों हम उस पुरानी हो आयो याद को कन्धों पर लादे उस मोड़ तक गए थे जहाँ से उस याद में बसे शख्स वहाँ से मुड़ गए थे . 

                                                                                                                                    

5 comments:

प्रवीण पाण्डेय 8 October 2012 09:08  

जब वर्तमान ठहरता है, स्मृतियाँ गतिशीलता बनाये रखती हैं।

PD 8 October 2012 19:39  

सुस्वागतम मित्र.

Shekhar Suman 15 October 2012 14:01  

आपको वापस देखकर अच्छा लगा.... :)

mahesh solanki 22 August 2014 12:06  

वाह उत्तम अभिव्यक्ति ।

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