अनिल कान्त :
मैं यह पोस्ट ना ही तो ज्यादा ट्रैफिक पाने के लिए लिख रहा हूँ और ना ही ज्यादा टिप्पणियों की खातिर।

आज जब मैंने नंदनी महाजन जी का ब्लॉग जख्म परेशां है चुप्पी से...देखा तो मुझे बहुत दुःख हुआ यह जानकर कि नंदनी महाजन जी ने हिन्दी ब्लॉग जगत को अलविदा कहते हुए अपना ब्लॉग बंद करने का निर्णय लिया।

मैं यहाँ किसी बात की व्याख्या नहीं करूँगा कि किसकी गलती थी, ये सब क्यों हुआ ? ना ही इन सब बातों में मुझे ज्यादा दिलचस्पी रहती है। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि हिन्दी ब्लॉग जगत में वैसे ही चन्द लोग अच्छा लिखने वाले हैं और अगर वो भी धीरे धीरे छोड़कर जाने लगे तो ये हिन्दी चिट्ठाकारी के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। यदि मैं हिन्दी चिट्ठा जगत को एक हार मानूं तो यकीनन नंदनी महाजन जी जैसे व्यक्ति उसका एक मोती जरूर हैं।

मैं उनसे आग्रह करता हूँ कि वो अपने लेखन को सुचारू रूप से जारी रखें, भले ही वो टिपण्णी का विकल्प अपने ब्लॉग से हटा दें। मैं चाहता हूँ कि नंदनी जी आप लिखें, मैं और मेरे जैसे लोग आपका लिखा पढ़ना चाहते हैं ।
चूँकि न ही तो आपके ब्लॉग के अब एकमात्र पन्ने पर कोई मेल-आईडी है और ना ही कोई टिपण्णी करने का विकल्प तो मैं ऐसे में चाहूँगा कि यदि कोई उन्हें जानता है, चाहे किसी भी तौर पर, तो उनको मेरा यह आग्रह पहुँचा दें।

यदि नंदनी जी आप मुझे पढ़ती हों या पढ़ें तो मैं आपसे यही कहना चाहूँगा कि आप आगे निरंतर लिखती रहें ।


आपका प्रशंसक एवं ब्लॉग परिवार का सदस्य
अनिल कान्त
अनिल कान्त :
कभी कभी मन करता है कि कई दिनों तक और कई रातों तक सोता रहूँ । इतना कि इस सोते रहने की सोच से निजात मिले । हर गम और हर परेशानी उस सोते हुए दिन रात में घुल जाए, चाहे कितने भी बुरे से बुरे स्वप्न आयें और मैं उन्हें देखूं, ख़ुद को मरते हुए, जीते हुए, तडपते हुए, सहमते हुए, सकुचाते हुए, लड़खड़ाते हुए, घबराते हुए । जब मैं उठूँ तो वह फिर से रह रहकर मुझे याद न आए ।

मन करता है कि किसी पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ कर वहाँ खड़ा हो जाऊँ और ज़ोर ज़ोर से चिल्ला चिल्ला कर अपना गला फाड़ लूँ । उस चिल्लाहट में मैं अपना वो सब गुस्सा, आक्रोश निकाल देना चाहता हूँ जो इतने सालों से मेरे अन्दर भरा हुआ है । जो लावा की तरह मेरी रगों में बह रहा है । मैं चाहता हूँ कि दूसरी पहाड़ों की चोटियाँ भी मेरे वह दर्द भरे, रोते हुए, चिल्लाते हुए स्वर सुनें और मुझे वापस करें । मैं चाहता हूँ उन्हें सुनना कि कैसे लगती है वो घुटन, वो आक्रोश, वो तड़प सुनने में, जो भरी है कई बरसों से मेरे अन्दर।

चाहता हूँ कि दौड़ता रहूँ-दौड़ता रहूँ और जब तक दौड़ता रहूँ जब तक कि मेरे कदम थक कर चूर नहीं हो जाते । चाहता हूँ कि साँसों के हाँफने की आवाज़ सुनूँ । मैं उसमें भी वो बसी हुई सहमी सी, दबी हुई सी बातें सुनना चाहता हूँ, जो मैंने कभी किसी कारण तो कभी किसी कारण न कह पायी ।

मैं जी भर के रोना चाहता हूँ, कई बरसों का जमा किया हुआ रोना । जो मैंने अपने बड़क्क्पन में, ये जताते हुए नही रोया कि मैं कमजोर नहीं हूँ, कि मैं बड़ा हूँ सबसे तो मैं कैसे रो सकता हूँ, कि मेरा रोना इन सबसे सहन नहीं होगा । पर मैं रोना चाहता हूँ बेतहाशा, इतना कि जो कभी फिर से रोने का मन ना करे ।

हाँ माँ मैं थक कर चूर हो जाता हूँ तो मन करता है कि फिर से बच्चों जैसा बनकर तुम्हारे गले से लिपट खूब रोयूं और कहूँ कि माँ "आई एम सॉरी" मैं तुम्हारे लिए इतना भी ना कर सका । मैं तुम्हारे हाथों से ढेर सारी मार खाना चाहता हूँ, कम से कम वो दर्द तो उस मार में जाता रहेगा । मैं चाहता हूँ कि कई कई दिन यूँ ही तुम्हारे पास रहूँ, तुम से ढेर सारी बातें करूँ, बचपन से लेकर अब तक की सभी बातें। वो बातें जो आज तक मैंने किसी से नहीं की । वो बातें जिन्हें कहने से मैं डरता हूँ, जो मैंने अपने "बेस्ट फ्रैंड" से भी नहीं कह पायीं ।

मन करता है माँ कि उस पुलिस अफसर के सामने खड़ा होकर उसे अपने दिल की सारी बातें कह डालूं और कहूँ कि बिना सहारे के जिंदगी जीने का सहूर क्या होता है ज़रा बताये । कैसे जी जाती है जिंदगी बिना पैसे, एक एक रोटी के लिए मोहताज़ होकर । मैं जानना चाहता हूँ उससे कि कैसे अच्छी अच्छी बातें कर सकता है कोई बुरे वक्त में भी । मैं उसी के लहजे में उसे एक लंबा भाषण देना चाहता हूँ, उसे घंटों अपने ऑफिस के बाहर खड़ा करके फिर अन्दर आने पर ढेर सारी उसूलों की बातें बताना चाहता हूँ।

मैं हर उस इंसान से उसी की वाली चालाकी की अदा से उसे चालाकी दिखाना चाहता हूँ और फिर उसे जी भर कर मुंह चिढाना चाहता हूँ । मैं चाहता हूँ कि वो बुरा माने और फिर दिखाने के लिए ये करे कि उसे बुरा नहीं लगा । मैं देखना चाहता हूँ उसके चेहरे पर उसी के जैसी चालाकी चलने के बाद के भाव ।

मैं आत्महत्या करने की सोचना चाहता हूँ और वो डर भी महसूस करना चाहता हूँ, मैं ये भी बताना चाहता हूँ कि बिना सफलता पाये मर जाने से मैं बहुत डरता हूँ । मैं डरता हूँ कि लोग मुझे डरपोंक, भगौड़ा और हारा हुआ कहेंगे । इस बात को अच्छी तरह जानते हुए भी मैं आत्महत्या के बाद के हालात देखना चाहता हूँ । लेकिन इन सबके बावजूद मैं आत्महत्या नहीं करना चाहता । मैं कोई भी ऐसी मौत नहीं चाहता जिसके बाद मैं कमज़ोर कहलाऊं ।

मैं तुमसे कह देना चाहता हूँ कि मैं तुमसे बहुत बहुत प्यार करता हूँ, उतना ही जितना कि बचपन में किया करता था । उतना हीं जितना कि तुम्हारा पल्लू पकड़ पीछे छुप जाने पर और खुशी से गले लग जाने पर जताता था । मैं कोई ऐसा ढंग खोजना चाहता हूँ जिससे मैं आसानी से सब कुछ बयाँ कर सकूँ...हर वो एहसास जो दबा कुचला है


मैं कहना चाहता हूँ माँ कि तुमने जितने भी ख्वाब देखे हैं, उन्हें पूरा करना चाहता हूँ । मैं कहना चाहता हूँ माँ, कि मैं कभी कभी बहुत उदास होता हूँ । हाँ माँ, मैं कह देना चाहता हूँ कि मेरे अन्दर बहुत कुछ ऐसा है, जो धीरे धीरे ज़मा होता रहा है-होता रहा है, पर आज तक दिल खोलकर किसी को भी नहीं कह सका...किसी को भी नहीं ।

जानती हो माँ मुझे ख़ुद को भी बताने में कभी कभी सोचना पड़ता है कि मेरे अन्दर क्या क्या है, जो बयाँ नहीं हुआ है । मैं दिल खोलकर बिना दिमाग की सुने, सब कुछ बयाँ कर देना चाहता हूँ...हर वो एहसास जो वर्षों से मेरे अंदर क़ैद है

* आतिशफ़िशाँ = ज्वालामुखी
अनिल कान्त :
कभी कभी लगता है कि दूर तलक चली जाती खामोश सड़क पर मैं तुम्हारे हाथों में हाथ डाल कर यूँ ही खामोश चलता चलूँ-चलता चलूँ । कभी कभी खामोश रहना भी कितना सुकून देता है, है न । तुम्हें पता है कि जब ख़ामोशी जुबां अख्तियार कर लेती है तो बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो हमारे सीने में दफ़न होती हैं, उन्हें ख़ामोशी ख़ुद-ब-ख़ुद दूजे के दिल तक पहुँचा देती है । कितना आसान है न ख़ामोशी की जुबां को समझना, या शायद हमें समझने की जरूरत कहाँ पड़ती है, वो तो ख़ुद-ब-ख़ुद हमारे कानों में संगीत बनकर गूंजती है ।

एक अर्सा हुआ जब से कुछ खोया-खोया सा जुदा-जुदा सा लगता है । लगता है कि कुछ है, जो यूँ ही समझ नही आएगा । मन करता है एक बार फिर से वही सब करूँ, वही सब सुनूँ, वही सब महसूस करूँ जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ होता रहा । तुम्हें याद है न वो सब...याद ही होगा...अभी जैसे कुछ रोज़ पहले की ही सी तो बात है । जब तुम मेरे साथ साइकिल के अगले हिस्से पर बैठ कितनी खुश हुआ करती थीं । उन भेड़ों को हांकने वाले को जबरन परेशान करने के लिए तुम घंटी बजा दिया करती थीं । कैसे खिलखिला कर हँसती थीं तुम, जब वो बोला करता कि क्या दीदी आप भी ।

जब उस हलकी हलकी उग आई हरी घास पर लेटे हुए आसमान में देखा करते और हमारे बीच कई कई बीत गये हुए पलों तक बात न हुआ करती । कैसे हम एक दूजे के दिल का हाल जान लेते थे बिना कहे, जैसे तुम कहना चाहती हो कि देखो तो वो वाला बादल दूल्हा सा लग रहा है और वो देखो वो टुकड़ा दुल्हन, कितनी खूबसूरत लग रही है न। देखो दूल्हा कैसे मुस्कुरा रहा है । ऐसी कितनी ही तो बातें थी जो हमारे दरमियाँ उस ख़ामोशी में हो जाया करती थीं।

जब तुम करवट बदल मेरे सीने पर अपने सर को रख लेती तो सच मानों उस पल लगता मैं जन्नत में हूँ । नहीं जानता कि कैसी होती होगी, लेकिन इससे अच्छी तो नही होगी न । तुम हो, मैं हूँ, हमारी बातें हैं, बेफिक्री वाला दिन, खुला आसमान, हरी घास, मदमस्त उड़ते से रंग बिरंगे पंछी, वो तितलियाँ और वो तुम्हारे झूठ बोलकर घर से बनाकर लाये हुए मेरे लिए परांठे । कभी तो लगता है कि जन्नत भी क्या ख़ाक होगी इसके आगे ।

जब तुम घास के तिनके को बार बार तोडा करतीं तो पता लग जाता कि कुछ सोच रही हो, किसी उलझन में हो । हर बार ही तो मैंने तुम्हें इसी तरह उलझन में पाकर तुम्हारे हाथों को अपने हाथों में लेकर और तुम्हारी आंखों में झाँककर पूँछा, कि क्या बात है और तुम भी न कह देतीं कि कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं । लेकिन अगले ही पल कैसे तुम सभी बातें कह दिया करती । तुम्हारी वो बातें, ढेर सारी बातें, प्यारी प्यारी, अपनी सी, भोली सी, मासूम सी । जिनसे मुझे उतना ही प्यार हो चला था जितना कि तुमसे, तुम्हारी प्यारी आंखों से, तुम्हारी उस मुस्कराहट से, तुम्हारी उन बच्चों जैसी हरकतों से था । सच में वो ख़ामोशी भी बहुत खूबसूरत हुआ करती थी । अपने अपने हाले-दिल बयाँ करने के लिए सबसे खुशनुमा, सबसे संजीदा और बिल्कुल अपनी सी ।

तुम्हें पता है कि उस ख़ामोशी में हम अपने सारे गम, सारी खुशी बाँट लेते थे । वो ख़ामोशी हमारी दोस्त हो जाया करती थी । उस ख़ामोशी के बने हुए तमाम अफ़साने हैं, जो मेरे जहन में जब तब यूँ ही आ जाया करते हैं और मैं मुस्कुरा जाया करता हूँ । ठीक उसी मुस्कराहट के जैसे जो तुम्हें सबसे अज़ीज थी । क्या वो खामोश से अफ़साने तुम्हारे पास भी आते हैं गुफ़्तगू करने...
अनिल कान्त :
हमारे एक मित्र थे बिल्कुल लखनऊ की नज़ाकत और नफ़ासत लिए हुए. वो अक्सर एक ज़ुमला इस्तेमाल किया करते थे " ये शरीफ़ हैं, इनकी शराफ़त की तो..." अब डैश-डैश पर मत जाइए. उसमें बहुत कुछ छिपा है, अजी मान लीजिए कि बहुत कुछ छिपा रहता है इस डैश-डैश में. मसलन... अजी गोली मारिए मसलन को. आप तो ख़ामाखाँ हमें पिटवाने पर तुले हैं मियाँ. अब जो कहीं हमारे उन नज़ाकत और नफ़ासत वाले भाई जान ने पढ़ लिया तो हमारी तो आ जाएगी ना शामत.
अब ये जिस तरह लोगों को शरीफ होने की ग़लतफहमी होती है ना, वो बहुत दूर तलक जाती है. अब कितनी दूर तलक जाती है, वो हमने कोई नापी थोड़े ना है! कमाल करते हैं आप भी. अब आप भी देखिए, आप आए थे हमारे यहाँ ब्लॉगिंग के बारे में जानने और हम भी क्या ले बैठे ? ना जाने क्यों शराफ़त के चोचले ले बैठे. तो ये शराफ़त की बात छोड़ते हैं फिर कभी फ़ुर्सत से करेंगे.

तो मियाँ ब्लॉगिंग तो बात ऐसी है ज़नाब, अच्छा चलो मोहतरमां भी, अब खुश सभी. कुछ ग़लतफ़हमियाँ ऐसी हैं जैसे कि :

1. लोग हमें सबसे ज़्यादा इसलिए पढ़ते हैं कि हम बहुत अच्छा लिखते हैं

रहने दीजिए ज़नाब/मोहतरमां अगर सभी लोग सबसे ज़्यादा अच्छा पढ़ने के चक्कर में आते हैं तो ऐसा नही है. ऐसे कई हैं जो बहुत बहुत अच्छा लिखते हैं और जहाँ गिनी चुनी दस्तक ही दिखाई देती हैं और फिर अच्छे लिखे हुए से तो किताबें भरी पड़ी हैं, पुस्तकालय भरे हुए हैं खचाखच.

किसी को पढ़ने लोग ज़्यादा इसीलिए आते हैं कि उसने पाठकों को महत्व दिया, उससे संबंध स्थापित किया, उनकी टिप्पणियो का जवाब दिया, उनके सवालों का जवाब दिया. धीरे-धीरे संबंधों को आत्मीय बनाया. समय समय पर, समय के हिसाब से विषय वस्तु बदली, पाठकों को काम की बातें भी बता कर चले. इन सबके साथ साथ मूल्यवान सामग्री भी प्रस्तुत की.

2. अगर मैं ये लिखूं तो लोग आएँगे

ऐसा कहाँ होता है जनाब. जब तक लोगों को पता ही नही होगा तब तक कहाँ पढ़ा जाएगा. आपकी उपस्थिति होना अनिवार्य है कि हाँ आप मौजूद हैं और आपने फलाँ बात लिख दी है. मान के चलिए अगर किसी जंगल में कोई पेड़ गिरता है और अगर वहाँ कोई नहीं तो क्या वो आवाज़ करेगा. या कोई अच्छी फिल्म आकर चली जाए बिना विज्ञापन के तो क्या आपको पता चलेगा कि वह अच्छी थी या बुरी. कई दिनों और महीनों बाद पता चलेगा कि वो अच्छी थी. देख लो भैया अब. अरे हाँ वो ज़नाब के साथ मोहतरमां भी जोड़ लें :)

3. आप बहुत सारा पैसा कमा लेंगे

अब ये ग़लतफहमी तो आप पाल ही नहीं सकते कि हिन्दी ब्लॉगिंग से आप पैसा कमा के अमीर बन जाएँगे. तो मियाँ इन सब चक्करों में अभी ना पड़ें और दिल खोलकर बिना किसी चक्कर के हिन्दी ब्लॉगिंग करके हिन्दी को बढ़ाने में योगदान दें. जो कुछ भी दे सकते हैं दे ही दीजिए, कम से कम आपके पास रखा रखा खराब तो नहीं होगा ना.

हाँ एक बार हमने अपने उन नज़ाकत और नफ़ासत वाले भाई जान को अनिल कांत के बचपन की प्रेमकहानी सुनाई. तो वो बोले "ये शरीफ हैं, इनकी शराफ़त की..." क्या कहा कौन अनिल कांत ? अमाँ यार रहने दो ऐसे ऐसे सवाल नहीं पूँछते, अच्छा नही लगता, अब ऐसे में वो बुरा मान गये तो. अब कुछ तो उनके बचपन की इस शराफ़त को जानते हैं, अरे मतलब पढ़ चुके हैं. अब जो जो रह गये हैं वो इस नन्ही सी गुमनाम मोहब्बत लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

बाकी जनाब/मोहतरमां ग़लतफ़हमियाँ तो ना जाने कितने कितने तरह की होती हैं. सब गिनायी नहीं जा सकती ना. कुछ एक आपकी नज़र में हों तो बतायें ताकि हम सबका भला हो सके. क्या कहते हैं ?
अनिल कान्त :
1. यह टिप्पणी प्राप्त होना कि "बहुत खूबसूरत रचना/ भावपूर्ण रचना/ Nice Post"

जब आपको इस तरह की टिप्पणी प्राप्त हो तो इसका तात्पर्य यह है कि पढ़ने वाले के पास आपकी पोस्ट के बारे में कहने को कु्छ नही है या बहुत से ब्लॉंगर सिर्फ़ बिना पढ़े अपनी अधिक से अधिक टिप्पणी दर्ज कराना चाहते हैं. इसका मतलब यह भी निकलता है कि आप ने इतना रोचक नही लिखा कि पाठक दिलचस्पी ले.

2. आगंतुकों के साधारण आँकड़े

आप बहुत से ब्लॉग पढ़ते हैं और अपनी टिप्पणी भी वहाँ छोड़ते हैं लेकिन फिर भी आपके ब्लॉग पर लोग नही आते. आप उनके ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी से उनसे बेहतर संवाद स्थापित करें, उनसे प्रश्न करें तो बेहतर स्थिति बनेगी.


3. कम सब्स्क्राइबर(ग्राहक)

0, 2, 5 सबस्क्राइबर ही हैं और बढ़ नही रहे. मतलब आप बहुत काम की सामग्री या दिलचस्प सामग्री पेश नही कर रहे जिसके आने का इंतज़ार पाठक को रहता हो.


4. अपने व्यस्त होने की बार बार ख़बरे देना

# दोस्तों मैं आजकल शहर से बाहर चल रहा हूँ इसीलिए ब्लॉगिंग नही कर रहा.

# दोस्तों पुनः माफी चाहूँगा आजकल मेरा कंप्यूटर खराब चल रहा है जिस कारण में कु्छ पोस्ट नही कर रहा.

# मैं वादा करता हूँ कि बहुत जल्द में कु्छ लिखूंगा, पक्का वादा.


5. एक लंबी श्रंखला आपके विज्ञापन से भरी होना

कई बार आपने ढेर सारी जगह विज्ञापन से ही भर रखी होती है और पाठक को पढ़ने में परेशानी का अनुभव होता है.


6. आपका ब्लॉग खुलते ही Popups का खुल जाना

या तो आपका ब्लॉग खोलते ही popups का खुल जाना या टिप्पणी के लिए क्लिक करते ही नयी खिड़की खुल जाना.

7. Autoplaying Audio

किसी ऑडियो का आपकी पोस्ट में या ब्लॉग में लगा होना जो अपने आप शुरू तो हो जाता है लेकिन उसे बंद करने का कोई समाधान नही होता.

8. Errors

आपका ब्लॉग खोलते ही इस तरह की समस्या आना और उनका लंबे समय तक बने रहना
* 404 Not Found
* Headers already sent
* Error establishing a database connection
* This account has been suspended
* Blog has been removed

9. Visitors का ब्लॉग पर आना लेकिन उसका टिप्पणी न करना. कई बार ऐसा होता है कि पाठक पढ़कर चला जाता है और टिप्पणी नही देता. इसके पीछे वजह हो सकती हैं कि आपने ऐसे विषय पर पोस्ट लिखी हो जिसके बारे में वह कुछ कहना न चाहता हो या पहले वह टिप्पणी करता आया हो लेकिन उसे उनमें पूँछे गये सवालों के जवाब ना मिले हों, आपका पाठक के साथ बेहतर संवाद ना हो

10. लगातार ऐसी ही पोस्टों का लिखना जिनमें पाठक को दिलचस्पी ना रही हो.

अतः इन सभी कमियों को दूर करके आप अपने पाठक बढ़ा सकते हैं और अपने ब्लॉग में जान डाल सकते हैं.

# वैसे आप लोगों ने मेरी पिछली पोस्ट "लेखक की मृत्यु" नही पढ़ी
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